Thursday, January 20, 2011

मेरे मित्र कृष्ण सिंह वैज्ञानिक चिंतन और बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उनके गंभीर विषयों पर लिखे लेखों से बहुत लोग परिचित होंगे पर संभवतः कम लोगों को यह पता होगा कि वे अच्छी कविताएं भी लिखने लगे हैं। उनकी रचनात्मकता के इस रूप को सामने पाकर हर उस परिचित को खुशी होगी जो चाहता होगा कि उनकी रचनात्मकता परवान चढ़े। बहुत अल्प समय के संपर्क के दौरान मैंने उनकी इस कला को समझा और उन्हें इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को सामने लाने के लिए लगातार उकसाता रहा। कह सकते हैं कि हमें (उन्हें भी) इसमें सफलता मिली और एक दिन जब चुपके से यह कविता (शायद औपचारिक रूप से पहली) लिखी और मेरे सामने रखी तो मैं फूला नहीं समाया। कड़वी सच्चाइयों को बेहद सरल तरीके से सामने रखने के बावजूद जितनी गहरी टिप्पणी इस कविता के माध्यम से कृष्ण ने एक चरित्र विशेष पर की है वह काबिलेतारीफ है। मुझे लगा कि इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि अन्य लोग भी उनकी इस कलात्मकता का रसास्वादन कर सकें। देखिए, पढ़िये और अगर कुछ हो तो बताइए।-------------

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सिस्टम का पुर्जा
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चुप्पी से सिहर उठता है वह
सच बोलता हूं तो पाल लेता है जन्मभर की दुश्मनी
उसके हमशक्ल बैठे हैं अलग-अलग कुर्सियों पर
वह कहीं भी मिल जाता है
बंद कमरे में, गली में, चौराहे पर, राह चलते और भीड़ में
अक्सर पास बैठ हुआ।
अपनी मूर्खता और कमीनेपन का
उसे एहसास है अच्छी तरह
उसकी बातों पर चेले लगाते हैं ठहाके
मौका मिलते ही सुनाने लगता है
अपनी कमीनगी के 'चमत्कृत किस्से।
पर हमेशा रहता है परेशान कि
मैं नहीं मिलाता उसकी हां में हां
जबकि वह चाहता है सब उसके सामने खड़े रहें नतमस्तक
जैसे वह खड़ा रहता है अपने से बड़ी कुर्सी के सामने
जी हां, हां जी, जी हां,
हैं, हैं, हां, हां
अक्सर ऊंची कुर्सी वाले से खाता है खूब गालियां
लेकिन कमरे से निकलते ही
नीचे वालों पर जमाने लगता है रौब
यही सिस्टम है
और वह इस सिस्टम का एक पुर्जा।

कृष्ण सिंह


Sunday, January 2, 2011

दिमाग


आइए देखते हैं, कैसे होता है
बड़ी जिम्मेदारी वाला काम
और कैसे तय होती हैं चीजें
एक अधिकारी ने सहयोगी से कहा
तुमने इसे इतना छोटा क्यों कर दिया
सहयोगी ने कहा, यह इतना ही है
बाकी सब इसी का दोहराव है
अधिकारी ने कहा, जो मैंने कहा वही करो
सहयोगी अपनी बात पर अड़ा और कहा
पहले बताना चाहिए था सिफारिशी है
मैं अपनी ओर से और बड़ा कर देता
अधिकारी ने कहा, छोटा-बड़ा मत करो
जितना मैंने कहा, बस उतना
ही करो
अपना दिमाग लगाने की कोशिश मत करो
इसके बाद अधिकारी खुद से ही बतियाया
बताइए भला, ये सब समझता ही नहीं
आदेश बजाने के बजाय दिमाग लगाता है
हम क्या कभी अपना दिमाग लगाते हैं
?
हम तो सिर्फ वही करते हैं जो कहा जाता है
इसीलिए हम अधिकारी
हैं और तुम कर्मचारी
इस ब्रह्मवाक्य को समझने की कोशिश करो
बच्चा देश ऐसे ही चलता है।

कनाट प्लेस में ३१ दिसंबर २०१० की रात

पिछले साल भी यही हुआ था लेकिन तब दिमाग यहां तक नहीं गया था। इस साल भी न जाता अगर मेरे साथी ने जिद की होती कि आइए चलें दमघोंटू माहौल से बाहर निकल बाहर की खुली हवा में सांस लें। यह जानते हुए भी कि सड़क पर किसी को भी निकलने नहीं दिया जा रहा है। सैकड़ों की तादाद में पुलिसकर्मी किसी भी आने-जाने वाले आम आदमी को लौट जाने की हिदायत दे रहे थे। यह ३१ दिसंबर २०१० की दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनाट प्लेस की रात थी। कोई दस बजा रहा होगा जब हम दोनों घुड़सवार पुलिसवालों की धमाचौकड़ी और वज्र वाहनों के बीच से गुजरने की जुर्रत करने की कोशिश कर रहे थे केवल खुली हवा में सांस लेने के लिए पर बाहर तो इमरजेंसी और कर्फ्यू जैसे हालात थे। इसके पहले भी एक बार करीब सात बजे के हम लोग निकले थे आइसक्रीम और पान खाने के लिए। तब देखा था कि दस-दस, बीस-बीस की संख्या में पुलिस वाले किसी भी खोंमचे वाले या आम आदमी को तत्काल कनाट प्लेस छोड़ देने के लिए सख्ती से हिदायतें दे रहे थे और ज्यादा नहीं करीब आधे घंटे के भीतर कनाट प्लेस को खाली करवा लेने में सफल भी रहे थे। रात दस बजे एकदम सन्नाटा। तब इक्कादुक्का लोग आ जा रहे थे और हम लोग भी हिम्मत जुटा कर आगे बढ़ते रहे। जैसे-जैसे आगे बढ़ते रहे, वैसे-वैसे नए-नए मंजर सामने आने लगे। मैक्डोनाल्ड खुला हुआ था और उसमें काफी भीड़ मौजूद थी, रोडियो में भी जश्न चल रहा था, एक अंग्रेजी नाम वाले रेस्टोरेंट कम बार में तेज आवाज में पाश्चात्य संगीत बाहर तक सुनाई दे रहा था जिससे साफ लग रहा था कि अंदर नए साल का कैसा जश्न मनाया जा रहा है, कैसल लाइन तक पहुंचते-पहुंचते सारा भ्रम दूर हो गया और अचानक महसूस हुआ कि आखिर कर्फ्यू जैसे हालात क्यों पैदा किए गए थे। वैसे तो कहने को इसके पीछे सुरक्षा का कारण बताया गया था और उसके पहले से आतंकी खतरे की आशंका जाहिर की गई थी लेकिन लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इन कुछ पैसे वालों को जश्न मनाने में किसी तरह की दिक्कत न पेश आए, इसलिए आम आदमी को दूर कर दिया गया हो। यह सवाल अपने आप आया कि अगर इन महंगे होटलों में देर रात तक सब कुछ चल सकता है तो गुब्बारे, सरककंदी, पान और आईसक्रीम आदि बेचने वालों को क्योंकर भगा दिया गया। तो क्या यह सब कुछ उन खास लोगों की खुशामदी के लिए किया गया? तो क्या वाकई सुरक्षा व्यवस्था को खतरा खोंमचे वालों और गरीबों से था? इस तरह के सवाल उठते ही हमारे सहकर्मी ने सहज ढंग से बताया कि यह कोई कठिन सवाल नहीं है बल्कि बहुत सामान्य सी बात है कि हमारे उदारवादी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री किसके हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं। उनके लिए गरीबों और आम आदमी का कोई मतलब नहीं है। वह तो इस खाई को लगातार चौड़ी करने में लगातार सफल भी हो रहे हैं। संभव है कि वाकई कोई आतंकी खतरा रहा हो, और अगर ऐसा हो तो उससे निपटने की पुख्ता व्यवस्था की ही जानी चाहिए लेकिन क्या गरीब और आम आदमी को पूरी दुनिया से काटकर ही ऐसा किया जा सकता है? अगर नहीं तो कुछ गिनती के लोगों के ऐशो आराम के लिए ही क्या यह सब किया जाना नैतिक है? नहीं है, पर हो तो यही रहा है। गरीबों के लिए नए साल का क्या मतलब? मतलब तो उनके लिए है जिनके पास अकूत पैसा और अकूत ताकत है। आखिर वही आदमी जो हैं और उन्हें ही है खुश होने का अधिकार है। बड़े-बड़े होटलों में खुशियां मनाने के सारे इंतजाम थे, हमें तो न आइसक्रीम मिली न पान ही मिल सका फिर भी हमें करना पड़ा नए साल का स्वागत क्योंकि यह उनका मौन व्यावसाइक आदेश था कि हमें भी नए साल पर लाख दुखों के बावजूद खुश होन होगा सो होना पड़ा। अच्छे लोगों को तो मुबारकबाद देनी ही थी, उन लोगों को भी देनी पड़ी जिनके प्रति शुभकामना का भाव रखना ही अपने आप में कष्टकारी होना चाहिए।

Thursday, December 2, 2010

नीतीश की जीत का मतलब

गतांक से आगे
बिहार के चुनाव परिणामों को लेकर जो निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं वे एकांगी लगते हैं। निश्चित रूप से लगता है कि कुछ बहुत कुछ अप्रत्याशित और चमत्कारिक है। जितनी ज्यादा सीटें राजग गठबंधन को मिलीं उसका अनुमान कुछेक लोगों को छोड़ दिया जाए तो किसी को नहीं था। एक तरह से विपक्ष का सफाया ही हो गया है। इससे हमारे संसदीय लोकतंत्र को लेकर भी चिंताएं होनी चाहिए थीं कि अगर जनता किसी एक व्यक्ति और पार्टी को इस तरह स्वीकार करने लगेगी तो कैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसके विपरीत इस पर खुशी का इजहार किया जा रहा है कि विपक्ष का कोरम ही नहीं हो पा रहा है और दोनों की भूमिका नीतीश कुमार को ही निभानी पड़ेगी। जरा सोचिए कि अगर आने वाले चुनावों में (जैसा कि बिहार में इस बार हुआ है) बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को सभी सीटों पर जिता दिया तो क्या होगा। यहीं से इस सवाल पर विचार करने की जरूरत पैदा होती है कि जिस जनादेश की बातें हमारी राजनीतिक पार्टियां और हमारे नेता करते हैं, उसका क्या अर्थ निकाला जाना चाहिए। इस संदर्भ में सबसे पहली बात यह है कि राजनीतिक चिंतकों को यह देखना चाहिए कि जनता को राजनीतिक रूप से कितना शिक्षित और प्रशिक्षित किया गया है। हमारा मानना है कि इस दिशा में भारत में रंच मात्र भी काम नहीं हुआ है। इसके विपरीत जनता को राजनीतिक विचारशीलता के लिहाज से काफी पीछे छोड़ दिया गया है। कोई कितना भी कहे कि आम मतदाता चुनाव के परंपरागत मानदंडों (जाति, धर्म, बाहुबल, धनबल और परिवारवाद) आदि से ऊपर अब विकास और अन्य मुद्दों पर अपने नेताओं का चयन करने लगा है, यह बात सहज रूप में गले के नीचे उतरने वाली नहीं लगती। कहा जा सकता है कि आम मतदाता अभी भी इन सबसे ऊपर नहीं उठ पाया है और वह आस्थाओं और अंधविश्वासों के आधार पर ही अपने जनप्रतिनिधियों का चयन कर रहा है। बिहार में इसका उदाहरण साफ देखा जा सकता है।
चुनाव के तरीकों को लेकर लंबे समय से कई तरह के सुझाव और कई शिकायतें आती रही हैं। कुछ तब्दीलियां भी समय-समय पर की गई हैं लेकिन अभी भी बहुत सारे सवाल अनसुलझे हैं। एक बड़ा सवाल यह रह गया है कि अभी भी करीब आधे मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते। इसे एक बड़ी समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए लेकिन इसकी लगातार अनदेखी की जा रही है। मतदान आवश्यक करने का भी एक सुझाव आता रहता है पर यह न तो व्यावहारिक लगता है और न ही इसे जबरदस्ती थोपना उचित लगता है। इसके बावजूद यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है। इस समस्या का समाधान इसलिए जरूरी लगता है कि कई बार बहुत कम लोगों के मतदान करने के बावजूद जनप्रतिनिधियों का चयन हो जाता है जो सार्थक नहीं लगता। इसी तरह प्रत्याशियों और पार्टियों को मिला मत प्रतिशत भी एक सवाल है। कई बार देखा गया है कि कम मत प्रतिशत हासिल करने वाले प्रत्याशी अथवा पार्टी विजयी हो जाती है और ज्यादा मत प्रतिशत वाले पराजित हो जाया करते हैं। इससे प्रत्याशी और पार्टी की जनता के बीच स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता का सही आकलन कर पाना मुश्किल काम होता है। प्रत्याशी चयन में परिवारवाद, बाहुबल, धनबल, जातीय समीकरण आदि भी कई ऐसे सवाल हैं जो अनुत्तरित रह गए हैं। महिलाओं और युवाओं का सवाल भी आजकल चुनाव में काफी उछाला जाता है लेकिन क्या उनका उचित प्रतिनिधित्व हो पा रहा है। बिहार के चुनाव के संदर्भ में भी इन सबको ध्यान में रखकर ही उचित विश्लेषण किया जा सकता है लेकिन बहुत कम लोगों के इसके मद्देनजर चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया है। माना जा रहा है कि बिहार में महिलाओं ने काफी बढ़ चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया और उनमें बहुतायत ने राजग के पक्ष में वोट दिया। इसके पीछे अन्य कारणों के अलावा महिला आरक्षण के सवाल पर नीतीश कुमार के दृष्टिकोण को भी माना जा रहा है। यहां पहला सवाल यह उठता है कि क्या उन्होंने अपनी सोच के मुताबिक प्रत्याशी चयन में महिलाओं को उनके अनुपात में टिकट दिया। इसका जवाब न में ही मिलेगा। कहा जा सकता है कि चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है और इसीलिए प्रत्याशी भी जीतने वाले ही उतारे जाते हैं पर क्या इससे लगता नहीं कि विचार और व्यवहार में बुनियादी अंतर है। अगर हम संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने की वकालत करते हैं तो पार्टियों में इसे क्यों नहीं लागू किया जा सकता। अगर ऐसा नहीं किया जा रहा है तो समझिए कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। नीतीश कुमार ने भी वोटों की खातिर पार्टी लाइन के विपरीत लाइन ली। जब संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर बहस चल रही थी तब वह बिहार में अपने अध्यक्ष शरद यादव के खिलाफ खड़े थे। इसे ही दोतरफा राजनीति कहते हैं। यही हाल उनका सांप्रदायिकता के सवाल पर भी रहा है। खुद को लोकनायक जयप्रकाश नारायण का असली वारिस कहलाना पसंद करने वाले नीतीश ने उसे पार्टी के साथ गठबंधन कर रखा है जिसे पूरे देश में सांप्रदायिक पार्टी के रूप में जाना जाता है। ऐसे में उसके एक नेता या कहें एक राज्य के मुख्यमंत्री के विरोध का क्या मतलब निकाला जाना चाहिए। क्या इसे सिर्फ इस रूप में नहीं लिया जाना चाहिए कि वोट और सत्ता की खातिर नीतीश कुमार वह सब कुछ करने तो तैयार नहीं हैं जो अनुचित है। यही हाल बाहुबल और जातीयता को लेकर भी रहा है। सत्ता की खातिर ही ऐसे लोगों को जदयू द्वारा टिकट दिया गया जिन्हें दागी के रूप में बिहार में जाना और पहचाना जाता है। जातीय समीकरण को भी पूरी तरह अंगीकार किया गया तो सिर्फ इसीलिए कि चुनाव एन केन प्रकारेण जीतना है। बिहार के चुनाव में भी इन सब को अच्छी तरह आजमाया गया और चुनाव जीतने के लिए वे सारे हथकंडे अपनाए गए जो किसी भी चुनाव में हर राजनीतिक पार्टी द्वारा अपनाए जाते हैं। पूरे पांच साल तक अन्य कार्यों के अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अन्य लोकप्रियता प्रदान करने वाले कार्यों के अलावा जिस बात पर सर्वाधिक ध्यान दिया वह यह कि कैसे अगला चुनाव जीता जा सकता है। इसके लिए जातीय समीकरण साधने के साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (जिसे वह खुद उचित नहीं मानते) करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अतिपिछड़ा और महादलित के नाम पर जातीयता को और मजबूत करने तथा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार के लिए न आने के उनके चुनावी तरीकों को इसी रूप मे देखा जाना चाहिए।
इस सब के बीच चुनाव जीतना एक बात है लेकिन असलियत तो सामने आ ही जाती है भले ही जनता इस सब को बिना ध्यान दिए किसी को भी सत्ता सौंप दे। यहीं से यह सवाल एक बार फिर मजबूती से खड़ा हो जाता है कि अगर मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक और परिपक्व हो तो ऐसा कतई नहीं कर सकता। शायद इसीलिए जो लोग विभिन्न कारणों से चुनाव का बहिष्कार करते हैं अथवा अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते उनमें से बहुतायत की यही धारणा होती है कि अगर इन्हीं में से एक को चुनना है तो बेहतर अपना वोट किसी को न दिया जाए। इसी तरह जो लोग वोट करने जाते हैं उनमें यह तर्क काम करता है जो प्रदत्त परिस्थितियों में जो बेहतर बता दिया जाता है उसे वे वोट दे देते हैं। नीतीश कुमार भी प्रदत्त परिस्थितियों में बेहतर विकल्प थे, सो मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया होगा लेकिन जिस विकास और सुशासन के नाम पर उन्हें इस तरह का भारी बहुमत मिला है वह विकास और सुशासन ऊपरी दिखावा ज्यादा लगता है। बल्कि इस तरह कहा जाए कि इसका प्रचार ज्यादा किया गया है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि अगर यह दोनों चीजें बिहार में नीतीश कुमार कुमार के गठबंधन को उनके नाम पर इतनी ज्यादा सीटें दिला सकती हैं तो गुजरात में नरेंद्र मोदी को क्यों नहीं दिला सकीं। गुजरात तो पूरी दुनिया में इस बात के लिए प्रसिद्धि पा चुका है कि वह एक विकसित राज्य है और इसका श्रेय भाजपा नरेंद्र मोदी को देती है, इसके बावजूद वहां का मतदाता मोदी को जिताता जरूर है लेकिन इतनी तादाद में सीटें नहीं देता जितनी बिहार में नीतीश कुमार को देता है। यहां यह भूलना नहीं चाहिए कि मोदी विकास के लिए उतना नहीं जाने जाते जितना वह गोधरा के कारण पूरी दुनिया में ख्यातिलब्ध हैं। यहीं से यह सवाल भी उठता है कि क्या इन दोनों राज्यों में और पूरे देश में विपक्ष नाम की कोई चीज रह गई है अथवा विपक्ष की असली भूमिका कोई पार्टी निभा रही है। कहना होगा नहीं क्योंकि गठबंधन राजनीति के इस दौर में हर स्तरीय पार्टी कहीं न कहीं सत्ता में है अथवा रह चुकी है या आशान्वित है कि उसे सत्ता मिल जाएगी। संभवतः कहीं न कहीं पार्टियों और नेताओं में यह धारणा भी बन गई है कि सत्ता के लिए सिर्फ बहुमत जरूरी नहीं है। झारखंड हाल का ऐसा सबसे बड़ा उदाहरण है जहां ऐसी सरकार बन गई है जिसकी कोई संभावना नहीं लग रही थी। इससे यह स्पष्ट है कि सत्ता अन्य कारणों की बदौलत भी हासिल की जा सकती है। तब क्या जरूरत है किसी का विरोध करने अथवा आंदोलन आदि करने की क्योंकि उसमें तो लाठियां भी खानी पड़ सकती है और जेल भी जाना पड़ सकता है। भूख हड़ताल भी करनी पड़ सकती है। जब जनता बिना यह सब किए ही सत्ता का स्वाद चखा सकती है तो क्या जरूरत है यह सब करने की। क्या कोई यह बता सकता है कि जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के नारे और इमर्जेंसी के खिलाफ चलाए गए संघर्षों के बाद कोई यह बता सकता है कि इस देश में कोई राजनीतिक आंदोलन हुआ है। अगर नहीं तो इससे कम से कम दो चीजें साफ होती हैं कि आज या तो देश में ऐसी कोई समस्या नहीं रह गई है जिसके खिलाफ आंदोलन चलाने की जरूरत है या फिर जब सत्ता ऐसे ही मिल जानी है तो क्या जरूरत है यह सब कुछ करने की। जरा सोचिए अगर बिहार और गुजरात में विपक्षी पार्टियों ने अपनी भूमिका निभाई होती तो जरूर परिस्थितियां कुछ भिन्न होतीं। उत्तर प्रदेश का पिछला विधानसभा चुनाव इस बात है उदाहरण रहा है कि मायावती ने मुलायम सरकार के खिलाफ काफी हद तक संघर्ष चलाया था जिससे वहां के मतदाताओं में एक उम्मीद जगी थी कि मायावती ही अपराधियों से लड़ सकती हैं और उन्हें मतदाताओं ने वोट किया था। यह अलग बात है कि आज एक बार फिर उत्तर प्रदेश में कमोबेश उसी तरह के हालात हैं जैसे मुलायम से शासन के दौरान थे। बिहार में भी यह नीतीश कुमार ही थे जिन्होंने लालू यादव के कुशासन के खिलाफ संघर्ष किया था और उसका फल उन्हें पिछले चुनाव में मिला था। लेकिन यहां यह उल्लेखनीय है कि इन राज्यों में मुख्यधारा की पार्टियों कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों ने जनता के पक्ष में कुछ भी नहीं किया और उसका खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ रहा है। देश की आजादी के बाद लंबे समय तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस तो वैसे भी मतदाताओं को अपना कर्जदार मानती है और यह तय मानकर चलती है कि मतदाता उसे पंडित जी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी के नाम पर वैसे ही जिता देगी। वह यह भूल जाती है कि दुनिया अब काफी आगे निकल चुकी है और उसका भी अब वह जमाना नहीं रह गया जो कभी हुआ करता था। लेकिन हेकड़ी है कि जाती नहीं। बिहार चुनाव में भी कांग्रेसी यह मानकर चल रहे थे कि उन्हें तो राहुल गांधी को भोली छवि देखकर मतदाता वोट कर देगा पर न ऐसा होना था न हुआ। इसी तरह के व्यामोह में वे कम्युनिस्ट भी फंसे रह गए कि जनता उन्हें इसलिए वोट कर देगी क्योंकि उन्होंने अतीत में बड़े आंदोलन चलाए हैं। वे यह समझ ही नहीं पाते कि अगर मतदाता को राजनीतिक रूप से तैयार नहीं करेंगे तो जूलूसों और सभाओं में तो जा सकते हैं लेकिन वोट भी कर देंगे, ऐसा नहीं होगा।
जब आप उनके लिए कुछ करोगे ही नहीं तो आपको सिर्फ इसलिए वोट नहीं कर देंगे कि कभी आप उनके लिए लड़े थे। इसी बिहार में कभी भाकपा माले की करीब दस सीटें हुआ करती थीं। भाकपा और माकपा भी वहां एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप मे जानी जाती थीं लेकिन धीरे-धीरे उनका इस कदर ह्रास हुआ कि यह दोनों पार्टियां तो सिरे से गायब ही हो गई थीं, इस चुनाव में भाकपा माले का भी पूरी तरह सफाया हो गया जबकि कुछ लोग (यह पार्टियां भी) यह मानकर चल रहे थे कि लंबे समय बाद तीनों पार्टियों के मिलकर चुनाव लड़ने का कुछ फायदा इन्हें अवश्य मिल सकेगा पर परिणाम आने के बाद इनकी असलियत भी सामने आ गई। पता नहीं कैसे भाकपा को एक सीट मिल गई। यहां इसका उल्लेख भी जरूरी है कि भाकपा माले की संसदीय राजनीति का एक उदाहरण तब भी सामने आया था जब उसके कई विधायकों को लालू यादव ने तोड़ लिया था। यहां बसपा की उस सोशल इंजीनियरिंग की पोल भी खुल गई जिसकी उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने बड़ी तारीफ की थी। वह सोशल इंजीनियरिंग बिहार में काम नहीं आई और वहां नीतीश की विकास इंजीनियरिंग काम कर गई। अब वही राजनीतिक विश्लेषक नीतीश की राजनीति के कसीदे पढ़ने में जुट गए हैं। वे राजनीतिक असलियत से पता नहीं क्यों इतनी जल्दी परदा कर लेते हैं। वे हर किसी सत्ताधारी का इस कदर गुणगान करने लग जाते हैं जैसे उसने उन पर कोई जादू कर दिया हो। जैसे बिहार में चुनाव परिणाम आने के साथ ही यह कहा जाने लगा है कि मतदाता अब जात पांत से ऊपर उठ चुका है। अब विकास की जरूरत है। इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा आदि न जाने क्या-क्या? उत्तर प्रदेश में बसपा को मिले बहुमत के बाद और फिर कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के बाद गठबंधन और एक पार्टी की सरकार को लेकर भविष्यवाणियां की जाने लगीं। अब एक बार फिर यह कहा जाने लगा है कि बिहार के परिणाम का व्यापक प्रभाव केंद्र की राजनीति पर भी पड़ेगा। मुझे लगता है कि इस तरह के निष्कर्ष निकालना बहुत जल्दबाजी होगी। बहुत फूल कर गुप्पा होने की जरूरत नहीं है। जरा याद करिए जब लालू यादव की सरकार बनी थी तब भी लोग उनका बहुत गुणगान करते थे । लालू के रेल मंत्री रहते हुए उनके रेल मंत्रालय के काम की पूरी दुनिया में कितनी सराहना की गई थी। मीडिया और राजनीतिक विश्वेषक भी तारीफ के पुल बांध रहे थे। बिल गेट्स तक लालू से पढ़ने का लालायित थे। मेरा यह मानना है कि जब किसी को सब कुछ सकारात्मक दिखने लगे तो समझिए कुछ गड़बड़ है। मनमोहन सिंह की भी लोग कोई कम तारीफ नहीं करते थे। लेकिन देखिए करीब छह साल में क्या-क्या सामने आने लगा है। मुझे याद है जब मीडिया में पहली इस तरह का विचार सामने आया था कि अब लोग नकारात्मक खबरें नहीं पढ़ना और देखना चाहते तभी मुझे यह शक हुआ था कि इस सकारात्मकता में सारी नकारात्मकता को छिपाने की कोशिश तो नहीं हो रही है। अब फिर यह खतरा बढ़ने लगा है। इसीलिए मेरा कहना है कि बिहार को लेकर बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है। कोई एक व्यक्ति पूरी व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। वह कुछ लोकलुभावन जरूर कर सकता है बुनियादी तौर पर कोई बदलाव नहीं ला सकता। बिहार में भी कोई बुनियादी बदलाव नहीं हो गया है पांच साल में और यह भी मानकर चलिए कि अगले पांच साल में आम लोगों का जीवन कोई सुखमय नहीं होने जा रहा है। जरूरत व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की है बिना इसके चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन लोगों का मोहभंग भी बहुत जल्द होता है। देखना यह होगा कि लालू ने करीब पंद्रह साल लगाया, नीतीश कितने साल लगाते हैं?

नीतीश की जीत का मतलब

पहले (चुनाव के दौरान) लगता था विकास का मतलब सड़कें बनना होता है। अगर कुछ सड़कें बन गई हैं तो समझिए विकास हो चुका है। चुनाव माने बिहार विधानसभा का चुनाव। जिस दिन मतदान का छठां यानि अंतिम चरण बीता, उसके अगले दिन घूम-घूमकर बतियाने वाले एक अंग्रेजी अखबार के संपादक ने विकास की नई परिभाषा गढ़ दी जिसे पढ़-सुनकर कोई भी तर्कहीन व्यक्ति मंत्रमुग्ध हुए बिना रही सकेगा। उन्होंने गीता की तरह का उपदेश दिया कि अगर किसी देशकाल को समझना है तो सड़क मार्ग से होकर गुजरिए और उन्होंने गुजरते हुए देखा कि बिहार की सड़कों के दोनों ओर अंडरगार्मेंट्स के विज्ञापन काफी तादाद में दिख जाएंगे। वे इस तथ्य को नए सिरे से स्थापित कर रहे थे कि बिहार का काफी विकास हो चुका है। यह और इसी तरह के कितने ही पत्रकार वह चाहे टीवी के हों अथवा प्रिंट के पिछले करीब पांच साल से यह बताते थक नहीं रहे थे कि बिहार काफी विकास करता जा रहा है। ऐसा कहते-बताते हुए वे रस, छंद अलंकार, संधि और समास समेत अभिधा, लक्षणा और व्यंजना कुछ भी छोड़ नहीं रहे थे। इसे सरल शब्दों में कहें तो ऐसा लगता था कि वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गुणगान में कलम तोड़ दे रहे थे। टीवी वाले भी कुछ ऐसा ही अपनी भाषा में तो़ड रहे थे। अब तो जनादेश ने भी साबित कर दिया कि वाकई बिहार विकसित हो चुका है और जो कुछ बच गया था वह अब चुटकियों का काम रह गया है। मुझे पता नहीं क्यों हमेशा यह सवाल उद्वेलित करता रहता है कि जहां एकतरफा सोच काम करती है वहां जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ होता है। बिहार और वहां के शासन-प्रशासन को लेकर भी यह लगता रहता था कि आखिर ऐसा क्या हो गया है बिहार में कुछ खराब दिखता ही नहीं। तब लगता है कि बिहार को देखने वाले शायद असली गांधीवादी हो गए हैं कि न बुरा देखना है, न बुरा सुनना है और न बुरा कहना है। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि बिहार और वहां के नेता पूरे देश से अलग कैसे हो गए। वहां के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ताने-बाने में तो कोई बुनियादी बदलाव आया था और नेताओं में भी कोई किसी दूसरे लोक से तो नहीं टपका था।
क्रमशः

Tuesday, November 9, 2010

तालियां और खुश

प्रतीकात्मक ही सही, लेकिन जब देश की राजधानी और कई अन्य जगहों पर प्रदर्शन और धरने हो रहे थे ठीक उसी समय हमारी संसद में तालियां गड़गड़ा रही थीं। हमारे सांसद अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की हर बात पर ऐसे ताली बजा रहे थे जैसे उन्हें यह कहकर ही बुलाया गया था कि जैसे ही एक वाक्य खत्म हो, जोरदार तालियां बजाइएगा और तहेदिल से शुक्रिया अदा कीजिएगा। यह मानना अतिशयोक्ति होगी कि ऐसा कर शायद ओबामा का किसी महानायक की तरह स्वागत किया जा रहा था लेकिन इसमें किसी तरह की कोरकसर नहीं छोड़ी गई। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी व सुषमा स्वराज के अलावा शायद ही कोई ऐसा मान रहा होगा पर लगता है कि अभिभूत तो कम से कम सभी थे । पर यह सवाल अपनी जगह रह गया कि क्या कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत का महानायक हो सकता है। वैसे किसी भी अतिथि का स्वागत होना ही चाहिए। ओबामा हमारे अतिथि से, इसलिए हमने भारतीय परंपरा का निर्वाह किया, ठीक किया। लेकिन ओबामा ने हमारे लिए ऐसा कुछ नहीं किया या कहा जिससे हम इतने आह्लालादित हो जाएं कि लगातार तालियां बजाते रहें। गांधी की ओबामा ने तारीफ की तो इसमें क्या। गांधी तो दुनिया के महानतम नेता रहे हैं। भला कौन ऐसा राजनीतिज्ञ होगा जो गांधी को नहीं मानेगा? यही बात सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता को लेकर है। अमेरिका ने शायद कभी इसका उल्लेखनीय विरोध नहीं किया। यहां भी वे यह तो कहते नहीं कि हम विरोध करेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि उसके अभी समर्थन करने से कोई भारत को यह मिलने नहीं जा रही है और जब मौका आएगा तब अमेरिका क्या करेगा, इसमें अभी कई पेंचोखम हैं। यही हाल आतंकवाद और पाकिस्तान को लेकर भी रहा। ओबामा के वक्तव्य पर ध्यान देना चाहिए कि उन्होंने कहा कि हम पाकिस्तान के साथ मिलकर आतंकवाद का खात्मा करेंगे। हम इसे सुनकर खुश हो सकते हैं लेकिन जरा सोचिए यह कितनी हास्यास्पद बात है कि जो (दुनिया जानती है ) पाकिस्तान आतंकवाद को पोस रहा है उसी के साथ मिलकर ओबामा आतंकवाद का खात्मा करने की बात कर गए और हम तालियां बजाते रहे। आउटसोर्सिंग पर भी उन्होंने केवल खुश करने वाली बात की। इस बारे में सच्चाई तो उन्होंने अमेरिका में ही कही थी और वही कर रहे हैं। इसके विपरीत वह आए और हमारे यहां से अपने यहां नौकरियां लेकर चले गए। हम इस पर भी मंत्रमुग्ध होते रहे कि ओबामा ने हमें विकसित देश माना और हमारे साथ बराबरी पर बात की। भारत अगर विकसित देश बन गया है या बन रहा है तो इसमें अमेरिका की क्या भूमिका रही है। अगर ऐसा है तो भारत अपने बल पर है। अमेरिका की यह मजबूरी है कि अब वह भारत को पहले की तरह नहीं हांक सकता। यह अलग बात है कि सब कुछ वैसा ही नहीं रहा जैसा माना और बताया जा रहा है।

क्रमशः

Monday, November 8, 2010

्ट ओबामा की भारत यात्रा

ऐसे समय जब वैचारिक क्षुद्रता बढ़ती जा रही हो और गंभीर तथा वैज्ञानिक चिंतन का सर्वथा संकट दिख रहा हो, तब बैठक की बैठकों में समसामयिक विषयों पर हो रही विचारोत्तेजक बहसें चीजों को बेहतर तरीके से समझने के लिए किसी के लिए भी मददगार हो सकती हैं। हाल के समय में प्रायः यह माना जाने लगा है कि अब किसी विषय पर समग्र रूप से चिंतन-मनन वाले मंच बहुत कम बचे हैं। कभी ऐसा दौर हुआ करता था जब राजनीतिक और सामाजिक संगठन इस काम को किया करते थे और उसका प्रभाव भी समाज और देश पर दिखाई पड़ता था। तमाम राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन इसके उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा आज के दौर में यह काम कोई नहीं कर रहा है। इसके उलट अब तो चीजों को गड्ड मड्ड करने की जैसे सुनियोजित कोशिश की जा रही है। बुराइयों को महिमामंडित करने और समस्याओं को उलझाने की सायास प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे वक्त इस बात की बेहद जरूरत है कि किसी विषय पर समग्र रूप से और मानवीय दृष्टिकोण के साथ विचार-विमर्श किया जाए। यह भी इसके लिए हमेशा उन कुछ लोगों की तरफ ही न देखने को मजबूर रहा जाए जो अपने विषयों के प्रकांड पंडित माने जाते हैं बल्कि खुद के उन अपनों से भी कुछ सीखने समझने की कोशिश की जानी चाहिए कहीं ज्यादा बेहतर और वैज्ञानिक तरीके से सोचते हैं और जिनकी सोच देश और समाज के लिए ज्यादा अहमियत हो सकती है। कहना होगा कि यह काम अपने छोटे से प्रयास में बैठक की ओर से बेहद संजीदगी के साथ किया जा रहा है। कश्मीर समस्या और अयोध्या मामले पर हुई इसकी पिछली दो गोष्ठियां किसी के लिए भी उत्साहित करने वाली हो सकती होंगी जिन्होंने इसमें शिरकत होगी या इसकी रिपोर्ट जिसने पढ़ी होगी। हमें यह बताते हुए अच्छा लग रहा है कि यह एक गंभीर और सकारात्मक प्रयास है जिससे हर उस व्यक्ति को लाभ होगा जो किसी विषय को समग्र रूप से जानना-समझना चाहता होगा।
इसी क्रम में रविवार सात नवंबर को कृष्ण भवन में बैठक की गोष्ठी में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा पर संगोष्ठी हुई जिसमें विभिन्न वक्ताओं ने अनेकानेक पक्षों पर भारत-अमेरिका संबधों पर विस्तार से बातचीत की। शुरुआत विनोद वर्मा ने की। उन्होंने बिल क्लिंटन और जार्ज बुश की यात्रा के संदर्भ में कहा कि बराक ओबामा के भारत आने पर उस तरह का उत्साह यहां के लोगों में नहीं दिखाई दे रहा है जैसा पूर्व में आए दोनों अमेरिकी राष्ट्रपतियों के आने के समय दिखा था और इसके पीछे शायद सबसे बड़ा कारण उनका अश्वेत होना है। उन्होंने इसका जिक्र भी किया कि कैसे बुश को छूने के लिए कई सांसद तक बिछे पड़ रहे थे। उन्होंने उस हार का जिक्र भी किया जो ओबामा अमेरिका में हुए चुनाव में झेल कर ओबामा यहां आए हैं। लेकिन उन्होंने भारत की इस मामले में तारीफ की कि अब वह अपनी आर्थिक कमजोरियों से लगातार उबर रहा है और यह पहला मौका है जब अमेरिका के साथ बराबरी के साथ खड़ा होने की स्थिति में आ रहा है। ओबामा के साथ सौदे भी बराबरी के स्तर पर किए गए। ऐसा तब है जब अमेरिका गंभीर आर्थिक मंदी को झेल चुका है और हमारी अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि इससे पहले तक अमेरिका भारत को छोटे भाई की तरह मानता रहा है। उन्होंने हालांकि इसकी आलोचना की कि ओबामा ने मुंबई में आतंकवाद और हेडली पर स्पष्ट कुछ भी नहीं कहा। इसी तरह कश्मीर पर ढुलमुल रवैया अख्तियार किया। थोड़ा विस्तार में जाते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका लाचार की तरह भारत आया है कि हमें बाजार दो। इसके बावजूद हमारी मानसिकता अभी भी याचक जैसी ही दिखती है। हम सब्सिडी उसी के कहने पर अपने यहां खत्म करते जा रहे हैं जबकि इसके उलट अमेरिका में ओबामा इसे जारी रखे हुए हैं। हम अपनी वर्कफोर्स वापस करने की स्थिति में नहीं जबकि ओबामा आउटसोर्सिंग खत्म करने पर तुले हुए हैं।
इसके बाद चर्चा को आगे बढ़ाया सुदीप ने। उनका कहना था कि ओबामा एक व्यापारी की तरह निकले हैं। इसीलिए उन स्थानों को चुना है जहां उन्हें व्यापार की संभावनाएं दिख रही हैं। लेकिन वह पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं। इसका भी एक खास संदेश है। संभवतः इस मामले पर ओबामा साफ हैं कि वे केवल अमेरिका के लिए निकले हैं। वे अपने यहां रोजगार बढ़ाना चाहते हैं। अब यह भारत को देखना था कि वह अमेरिका और ओबामा की कमजोरियों को कैसे अपने पक्ष में भुना सकते थे जो करने में भारत असफल रहा है। भारत अपनी शर्तों पर अमेरिका के साथ सौदेबाजी कर सकता था जो वह नहीं कर पाया।
शंभू भद्रा का कहना था कि यह पूरी तरह कारोबारी यात्रा है। आर्थिक मंदी के कारण अमेरिका की हालत बेहद खस्ता है। कई पैकेज देने के बाद भी अमेरिका की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आ पाया है। उन्होंने इसका बहुत स्पष्ट उल्लेख किया कि रिलायंस और स्पाइस जेट खुद अमेरिका में इंट्री की कोशिश में लगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी निवेश भारत में इंफ्रास्टक्चर में नगण्य है। वीजा और आउटसोर्सिंग नीति में बदलाव उसकी नीति का नतीजा है जिसका नुकसान भारत को उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भारत का महत्व अमेरिका के लिए सिर्फ बाजार के लिए है बराबरी का नहीं है। अमेरिका अगर किसी से डरता है वह एकमात्र चीन है।
पार्थिव ने अपनी बात की शुरुआत एक अखबार में छपे उस कार्टून से की जिसमे प्रधानमंत्री को एक तख्ती लिए बहुत छोटे कद का दिखाया गया है। उनका कहना था कि उस कार्टून के माध्यम के यह समझा जा सकता है कि भारत की अमेरिका के सामने क्या औकात है। उनका कहना था कि ओबामा के रूप मे अमेरिका कोई लोटा लेकर भारत नहीं आया है बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह आया है। हमें किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए बल्कि स्पष्ट होना चाहिए कि वह शासनतत्र पर कब्जा करने के लिए आया है। उनका यह भी कहना था कि ओबामा को अश्वेत डेमोक्रेट के रूप में नहीं देखना चाहिए सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि ओबामा को भोपाल का भी जिक्र करना चाहिए था जो उन्होंने नहीं किया।
लाल रत्नाकर का कहना था कि ओबामा को खास रिश्तेदार की तरह बुलाया गया है। अब बुलाया गया है तो कोई तो बात होगी। उनका कहना था कि रंगभेद की नीति अभी खत्म नहीं हुई है। अमेरिका में भी अश्वेत का मुद्दा है। इसके विपरीत भारत बहुरंगी देश है। उनका कहना था कि हमारी सरकार को अपने देश में रोजगार की कोई चिंता नहीं है। उनका कहना था कि अमेरिका को भारत में अभी भी दुश्मन के रूप मे देखा जाता है। अश्वेत होने से नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं आ जाता, यह देखना महत्वपूर्ण है। ओबामा व्यापारी ही नहीं हैं वह विचार और ब्रांड अंबेस्डर भी हैं।
श्रवण ने कहा कि हमें सिर्फ यह मानना चाहिए कि ओबामा के रूप में सिर्फ अमेरिका का राष्ट्रपति आया है। किसी कंपनी के सीईओ की तरह आया है। ओबामा सिर्फ व्यापार करने नहीं आए हैं। यह देखने वाली बात है कि वह हमारे पड़ोसियों को भड़काता है। इसके बाद भी पराकाष्ठा देखिए कि वह मुंबई में आतंकवाद का जिक्र तक नहीं करता। हमें अब यह तय करना होगा कि अमेरिका के साथ किस तरह खड़ा होना है।
तड़ित कुमार ने बहुत साफ कहा कि ओबामा नहीं अमेरिका का राष्ट्रपति आया है। इसलिए इतना हायतौबा मची है। अभी कुछ समय पहले जापानी नेता आया था तब किसी को पता ही नहीं चला। अश्वेत राष्ट्रपति के मसले पर उनका कहना था कि अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने का मतलब था। ओबामा की यात्रा के बाद अगर हमारे देश में गेहूं की कीमत में कोई अंतर आए तो मतलब है। हम जिस तरह उसके आगे बिछे जा रहे हैं वह हमारी गुलामी की मानसिकता का परिचायक है।
प्रकाश चौधरी ने कहा कि अमेरिका वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उसकी चौधराहट पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। इसीलिए उसका नया हथियार आतंकवाद और पर्यावरण बन गया है। उनका कहना था कि भारत और अमेरिका की वर्तमान स्थित महत्वपूर्ण है। अमेरिका अन्य देशों को अपनी प्रापर्टी मानता है। मानसिकता का भी टकराव है। भारत के संदर्भ में उनका कहना था कि पैसा आपके पास आ भी जाए तो बहुत अंतर नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि सबसे दुखद यह है कि भारतीय राष्ट्र का कोई क्लैरिफिकेशन नहीं है। इस यात्रा में भारत सरकार का कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। उनका कहना था कि अंबानी हमारे प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्होंने कहा कि समझौता बराबर की शक्तियों से होता है। अमेरिका अपनी ही शर्तों पर ही समझौते कर रहा है। गोष्ठी का संचालन रामशिरोमणि शुक्ल ने किया।